1942 की भावना दोबारा पैदा करने का समय

- डाॅ॰ मो॰ मन्जू़र आलम

ब्रिटिश राज के अधीन दशकों की राजनीति के बाद भारतीय राष्ट्रीय काँगे्रस ने आख़िरकार, 1942 को यह तय किया कि अब बहुत हो गया और हरेक मिशन, कमीशन, याचिका एवं अनुरोध बेकार चला गया। भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस के नेतृत्व में अधिकांश लोगों ने यह निर्णय लिया कि अब राज के लिए अपने तम्बू लपेटने, अपना सामान बाँधने और वहां लौटने का वक़्त आ गया है जहां से अर्थात् ब्रिटेन से वह आया था (जिसे वे हेकड़ी में ग्रेट ब्रिटेन कहा करते थे ) कांग्रेस ने ‘‘भारत छोड़ो’’ का आह्वान किया और लोगों ने जोश-ख़रोश से ब्रितानी शासकों से पूरी तरह भारत छोड़ने और देश को भारतीयों के हवाले करने की मांग दोहराई।

उस समय उस नज़रिये से पंडित नेहरू की ‘‘भारत के भाग्य के साथ एक वास्ता’’ की घोषणा का औपयारिक पल सिर्फ पांच साल दूर था। आज हमें भारत के राष्ट्रपति का उद्घाटन भाषण सुन कर बहुत दुःख होता है जिसमें से नेहरू के नाम की बुलंदी को भद्दे दंग से निकाल दिया गया। ऐसे महान् स्वतन्त्रता सेनानी की, जो ‘‘दार्शनिक राजा’’ का भी नमूना था, एक असाधारण बुद्धिजीवी और एक संवेदनशील व्यक्ति था, जिसे आधुनिक भारत तथा उसकी लेकतान्त्रिक संस्थाएं बनाने का श्रेय जाता है, इतिहास व भारत के लोगों द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती।

हालांकि अमेरिकी या फ्रांससी राष्ट्रपति की तरह भारत के राष्ट्रपति को असीम अधिकार प्राप्त नहीं हैं और उसके भाषण का परीक्षण गृह मंत्रालय द्वारा किया जाता है, लेकिन नेहरू को हटाकर उनके स्थान पर भाजपा सिद्धान्तकार पं0 दीनदयाल उपाध्याय (जिन्होंने कभी न तो आज़ादी के आन्दोलन में हिस्सा लिया था और न ही आधुनिक भारत के निर्माण में ही उनकी कोई भूमिका थी) को दुनिया भर में आज़ादी के योद्धाओं और भारत के निर्माताओं के साथ विश्वासघात के तौर पर देखा गया है।

भाजपा शासन के तीन साल बाद भारत 75 साल पहले किये गये वायदे और 15 अगस्त, 1947 की रात में भाषण में पेश की गयी नेहरू की ‘‘भाग्य के साथ एक वास्ता’’ में भारत की झलक से दूर हो चुका है। अभी ‘‘भारत छोड़ो’’ घोषणा की 75वीं वर्षगांठ मनाने का समय है और आनेवाले कुछ दिनों में हम अपनी आज़ादी का 70वां साल मनाएंगे। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि हम धीरे-धीरे और लगातार अपनी आज़ादी के संघर्ष और उसके दिलेरों की विरासत तथा उनके आदर्शों से दूर होते जा रहे हैं।

इस नाज़ुक घड़ी में, जब एक बार फिर हम और चीन आमने-सामने हैं, देश के लोगों को एक जुट करने की जगह संघ धर्म के आधार पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ दुःस्साहसी नफ़रत का अभियान चला कर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर रहा है।

एक देश के तौर पर हमारे पास करने के लिए बहुत कुछ है। इसके बावजूद कि हम बड़ी अर्थ-व्यवस्थाओं में सबसे ज़्यादा तेज़ी से उभर रहे हैं, दुनिया के सबसे गरीब लोगों में से आधे लोग भारत मंे रहते हैं। यहां तक कि अपेक्षाकृत छोटे और गरीब देशों की तुलना में हमारे बच्चों में कुपोषण तथा अस्वद्ध विकास की दर ज़्यादा है। हम अब भी मध्यम आय वाले देशों, जिनकी प्रति वयक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जी0 डी0 पी0) 1,772 डाॅलर और पी0 पी0 पी0 7,110 डाॅलर है, से भी काफ़ी पीछे है।

आज नेहरू की लोकतान्त्रिक विरासत बिखर गयी है। आज़ाद विचार और स्वतन्त्र शोध के हैदराबाद तथा दिल्ली विश्वविद्यायल जैसे प्रमुख शिक्षण संस्थान उन अन्य विश्विद्यालयों में हैं, जो घेरे में हैं। छात्रों के तरूण उत्साह को उन पर देशद्रोह के मुकदमे दायर कर नष्ट किया जा रहा है। दलित छात्रों की आकांक्षाओं को उन्हें छात्रवृत्ति से वंचित कर कुचला जा रहा है। दलित शोध छात्र रोहित वेमुला खुदकुशी करने के लिए मजबूर किया जाता है। नयी व्यवस्था के संरक्षण में दाभोलकर तथा पनसारे जैसे आज़ाद विचारकों को गोली मार दी जाती है, गो रक्षकों के वेश में गुण्डा दस्तों द्वारा भीड़ लगा कर निर्दोष लोगों की हत्या कर दी जाती है। कहां है हमारा लोकतन्त्र? क़ानून का राज?

आयकर और पुलिस छापों के ज़रिये प्रतिपक्ष की आवाज़ दबाई जा रही है। दबाव में आकर ईमानदार पत्रकारों को बर्खास्त कर मीडिया की आवाज़ बन्द की जा रही है। आज ऐसा कोई टी0 वी0 चैनल नहीं है, जो सवाल कर सके या ईमानदारी से रिपोर्टिंग कर सके। एन0 डी0 टी0 वी0 जैसे अलग चैनलों को काफ़ी परेशान किया जा रहा है। उनका समर्थन करने वालों के दफ़्तरों और परिसरों पर पुलिस के लोगों तथा कर अधिकारियों द्वारा छापे डाले जा रहे हैं। यहां तक कि उस होटल पर भी छापा डाला गया जहां कांगे्रस के विधायक ठहरे हुए थे। प्रतिपक्ष के लिए कोई जगह नहीं है, फिर भी यह एक सच्चाई है कि प्रतिपक्ष अथवा असहमति के अधिकार के बग़ैर लोकतन्त्र बाक़ी नहीं रह सकता। मुटठीभर प्रिन्ट मीडिया जो सच्चाई उजागर करने की कोशिश करती है, उसे सरकारी विज्ञापन नहीं दिये जाते। कहां हैं बोलने की आज़ादी?

इस शुभ दिवस पर हम अपने लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक मूल्य बहाल करने का संकल्प लें। हम इसके लिए संघर्ष करें। ‘‘भारत छोड़ो’’ वर्षगाँठ का यही संदेश है।

(लेखक आल इण्डिया मिल्ली काउंसिल के महासचिव हैं)


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